भेड़िया



छठवीं क्लास की राधा अपने घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर, स्कूल के पार्क में खेलने आई है, खेलते खेलते शाम के 6 बज चुके हैं, ठंडी का वक़्त है, अँधेरा गहरा रहा है।
"चलो घर तुम्हारी मम्मी बुला रही हैं, इतने देर तक क्यों खेल रही हो, वो गुस्सा हो रहीं", अशोक भैया ने बोला। अशोक की उम्र 23 साल है और राधा के पडोशी हैं, घर में आना जाना है उनका। 
राधा तुरंत घर जाने के लिए उनके साथ निकलती है, अशोक का दोस्त प्रशांत बाइक स्टार्ट करता है, फिर राधा बैठती है, अशोक राधा के पीछे बैठता है; बाइक चलने लगी,थोड़ी देर बाद राधा को कुछ असहज लगा, अशोक का हाँथ उसके जांघो पे है और जांघो को सहला रहा है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा पर उसे बुरा लग रहा वो बार बार हाथ हटाती है पर वो बार बार हाथ रख लेता है; अब तो कमर भी पकड़ ली है अशोक ने । राधा को डर लग रहा, बहुत डर, वो जल्दी से घर पहुंचना चाहती है; उसे अपनी मम्मी कि याद आ रही और पसीने से उसका पूरा माथा और शरीर तरबतर है। बाइक रूकती है अशोक के घर के पास वो लोग उतर जाते हैं; "चलो अंदर तुम्हारी मम्मी यहीं हैं, मेरे घर पे" अशोक ने कहा। ...... राधा दौड़कर अपने घर की तरफ भागी और चिल्लाकर बोलती है; "तुम गंदे और झूठे हो".....
अशोक और उसका दोस्त ठहाके मारकर हँसते हैं। राधा अपने घर पहुँचती है; माँ ने गेट खोला और बोलीं "पापा तुम्हे लेने गए हैं पार्क,तुम कैसे आई?" राधा ने कोई जवाब नहीं दिया, अपने कमरे में चली गई; उस दिन उसने खाना भी नहीं खाया और सोने चली गई; रात भर वो रोती रही तकिये में अपना चेहरा घुसाकर, उसे अपने शरीर के हर हिस्से में जख्म सा महसूस होता है; हर वो जगह जहाँ उस अशोक ने अपनी गन्दी भावना से हाँथ फेरे थे उसे वो काट कर अलग कर देना चाहती है। इस घटना ने उसे अंदर से तोड़ दिया वो जब तक उस शहर में रही, आत्मविश्वास खोती रही और डरती रही।
आज 5 साल बाद घर लौटी, ग्रेजुएशन कर चुकी है और सरकारी नौकरी भी लग चुकी है उसकी; शाम को टहलने निकली अचानक उसे अशोक दिखा उसके साथ एक 3-4 साल की बच्ची है; वो अशोक को पिछले 11 साल से नज़रअंदाज़ करके चली जाती थी पर आज जब उसने अशोक को देखा और उस बच्ची की कोयल सी प्यारी आवाज़ ने अशोक को पापा बोला तो राधा खुद को रोक नहीं पाई; अशोक के पास पहुँचकर बोली,"ये आपकी बिटिया बड़ी प्यारी है अशोक भैया भगवान इसका बहुत ख्याल रखें, यही प्रार्थना है और आप भी इसका बहुत ख्याल रखियेगा इस शहर में भेड़िये बहुत हैं,"राधा उस छोटी बच्ची को दुलार करके आगे चली जाती है; अशोक किसी पत्थर कि मूरत सा खड़ा था उसे ग्लानि हो रही साथ ही साथ डर भी लग रहा, अपनी फूल सी बिटिया कि सच में चिंता है उसे क्यूंकि वो जानता है,शहर में भेड़िये बहुत हैं।



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