द पीपल ऑफ इंडिया

हम तो पा चुके
जीवन का रहस्य, साथियो।
धर्म से मत डरो,
जिन्हें पालना है उन्हें पालने दो,
डरने का स्वातंत्र्य भोग लेने दो,
कोई किसी को जगा नहीं सकता।
जब तक कोई खुद जागने की चाह ना रखें।
हम जागृत होने चाहिए
की हम कौन है।
हम, भारत के लोग,
वी, द पीपल ऑफ इंडिया।
हम भारत के नागरिक है।
हमें व्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार प्राप्त है।
हम मुसलमान नहीं है।
हम ब्राह्मण नहीं है।
हम भारत के नागरिक है
और हमें यह अधिकार प्राप्त है कि
हम किसी भी धर्म को मां सकते है
और हम किसी भी धर्म को
नहीं भी मान सकते।
हमें अध्यात्म में मानने का अधिकार है।
चूंकि हमें कल्पना करने करने का अधिकार है।
कला भी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है।
हम नास्तिक होने के लिए स्वतंत्र है
भगतसिंघ ने खुद को नास्तिक
घोषित करने की
स्वतंत्रता को भोगा था।
वह बीसवीं सदी के आरंभ का
मॉडर्न इंडिया था।
भगतसिंघ थे
विचारों का उड़ता पंजाब।
सावरकर ने खुद को नास्तिक कहा
यह भी स्वतंत्र ने भारत की सोच थी।
आंबेडकर ने भारत को
स्वतंत्रता, समानता, बंधुता का नया विचार दिया।
उस के प्रेरक नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य थे,
मानववादी मानवेन्द्र।
संविधान को लोग अपने अपने नज़रिये से देखते है।
कोई बुद्धिज़म का आधुनिक संस्करण कहते है।
कोई फ्रांस तो कोई अमेरिका के संविधान से हमारे,
दुनिया के सब से ज़्यादा आबादी वाले लोकतांत्रिक देश के संविधान की  तुलना करते है।
वो जो भी हो।
आज हम कह सकते है कि हम
सिर्फ स्वतंत्र देश के स्वतंत्र व्यक्ति
के रूप में खुद का परिचय दें
उतना पर्याप्त है।
बाकी तू जो भी हो अपने घर में,
मैं भी अपने घर में।
हम स्वतंत्र राष्ट्र भारत के नागरिक है।
हम ऐसा कुछ भी लिख सकते है, बोल सकते है, कर सकते है, कह सकते है जिस की स्वतंत्रता हम को हमारे संविधान ने दी हो।
गर्व से कहो
मैं एक भारतीय हुं।
हमे हमारी इक्कसवीं सदी में
भारत से जगत को कुछ संदेश देना होगा।
नो जय श्री राम, नाओँ रघुपति राघव राजा राम।
नो अल्लाह हु अकबर, नो जय भीम।
जय भारत, जय भारत।
जय भारत।

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