बचपन लौट आ...

बचपन लौट आ...
मुझे एक बार फिर से,
जीने दे...!
वो बाबू जी की,
उँगली पकड़कर,
दूर सैर तक जाने दे।

खेतों के कच्चे रस्तों पर,
गिरने दे,उठ जाने दे,
ठंडे बालू रेत पर,
लंबी छलांग लगाने दे।

चिकनी मिट्टी से खिलौने,
कुछ सुंदर घर बनाने दे,
गुड्डे-गुड़ियों की शादी,
का उत्सव मनाने दे।

ईट की गाड़ी सजाकर,
घर-आंगन में घुमाने दे,
रद्दी कागज को फाड़कर,
बारिश में जहाज तैराने दे।

चोर-सिपाही के खेल में,
फिर राजा बन जाने दे,
दोस्तों में एक बार मुझे,
फिर अब्बल आ जाने दे।

माँ से पच्चीस पैसे लेकर,
एक सुंदर पतंग उड़ाने दे,
कुछ पैसे की डोर खरीदू,
बाकि मीठी गोली खाने दे।

साइकिल का टायर दौड़ाकर,
पूरी गली घूमाने दे,
दोस्तों संग गप्पे लड़ाकर,
सुबह से शाम हो जाने दे।

बचपन लौट आ...
मुझे एक बार फिर से,
जीने दे....!!
              

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