आत्मसम्मान
मोहन लाल शर्मा बाजार जा रहे थे कि अचानक किसी ने पीछे से टोका शर्मा जी कैसे हैं। पीछे से जानी पहचानी आवाज सुनकर शर्मा जी ने मुड़कर देखा, देखते ही उन्हें झटका सा लगा कि अभी कुछ साल पहले यही लड़का जब मैं काफी संपन्न था, मुझे चाचाजी कहता था और देखते ही नमस्कार करता था, पर आज जबकि मेरी हालत थोड़ी ठीक नहीं है तब यह मुझे शर्मा जी कहकर संबोधित कर रहा है। कहीं ऐसा ना हो कि 2 दिन बाद यह मुझे भरे बाजार में अरे शर्मा कहां चले कह कर संबोधित करे। वे उस लड़के के पास गए और कहा क्षमा करना मैंने तुम्हें पहचाना नहीं। ऐसा कह कर वे वापस मुड़कर तेजी से बाजार की भीड़ में कहीं खो गए।
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