कबाड़
सुरभि के पति का ट्रांसफर नऐ शहर में होने पर,
घर व्यवस्थित करने में एक सप्ताह का समय लग गया।पड़ोसी सिन्हा जी के यहाँ से चाय नाश्ता भी आया था,पर मुलाकात नहीं हो सकी।
आज सुरभि मिलने और धन्यवाद देने के लिए उनके घर गई।
स्वागत पामेरियन डाग ने किया।
आलीशान घर,मंहगे फर्नीचर विलासिता की सारी वस्तुएं उनके शानो शौकत को बयान कर रही थीं।सिन्हा साब इंजीनियर जो हैं।
"टॉमी ने आपको परेशान तो नहीं किया।"
"नहीं नहीं ,रामू के आने से चुप हो गया।"
"बहुत ही शरारती है,घर में सबका प्यारा है।देखो उसका बिस्तर ,जमीन पर नहीं सोता।"
"अरे वाह छोटा सा कूलर भी।"
फोन आने पर मिसेज सिन्हा व्यस्त हो गई,तभी समीप के कमरे से कराहते हुए पानी, पानी की आवाज ने सुरभि के ध्यान को बरबस उस ओर खींचा।
साधारण सा कमरा, पुराना सा सीलिंग फैन,पलंग पर लेटी वृद्ध महिला पानी मांग रही है।
जग से पानी निकाला ,"अरे यह तो गर्म है,ठंडा लाकर देती हूँ।"
"नहीं यही दे दो,सूखी घास पर कोई ठंडा पानी क्यों सींचेगा।"
"आप कौन हैं।"
"मैं इनकी मां,पर काश इनका कुत्ता होती तो भरपेट..."
आगे वह सुन न सकी,और बाहर आ गई।कमरे से निकलता देख मिसेज सिन्हा बोली, "इनको छूत की बीमारी है, इसलिये..."
बुढापा सचमुच छूत की बीमारी है,जो बिन छुए भी सबको लगती है।
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