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Showing posts from 2019

चाय के नुक्कड़

कभी-कभी नहीं अक्सर ही मेरे दिल में खयाल आता है... कि शहर के हर चौराहे पर, हर एक नुक्कड़ पर.... चाय की एक गुमटी औरतों के लिए भी होनी चाहिए जहाँ खड़ी हो कर कभी अकेले तो कभी अपने दोस्तों के संग बीच बाज़ार, भरे चौराहे, ठहाके लगा सकें साझा कर पाएं अपने घुमक्कड़ी के किस्से नौकरी की परेशानियां नज़रंदाज़ कर दी गयी फब्तियां देश की इकॉनमी पर अपने विचार वायरल हुए जोक और मीम्स और वो सब कुछ जो उनके मन की चारदीवारी में खरबों युगों से ज़ब्त है एक धौल में सारी मायूसी लापता हो जाये चाय की चुस्कियों के मिठास में गुम हो जाये... बेटी के इंजीनियरिंग एंट्रेंस की चिंता नौकरीपेशा बेटे के लिए अपनी जैसी हूबहू बहु लाने का सपना बंद हो जाये... इतनी देर कैसे हो गयी, इतनी देर कहाँ रह गयी घर का कुछ ध्यान है या नहीं जैसे अनगिनत सवालों का गूंजना और सबसे बड़ा सवाल कि ''आज खाने में क्या पकेगा?'' की पकाहट से कुछ पल के लिए सही मिल जाये मुक्ति औरतें अपने सारे फ़िक्र, सारी परेशानियां पास पड़े कूड़े के डब्बे में फेंक दें और मुस्कुराते हुए कहें... चल यार! कल मिलते हैं इसी समय अप...

हद जिंदगी की

          "मम्मा, मुझे एक्सट्रा क्लासेस केलिए देर हो रहा है।मैं चलती हूँ" यह कहके राधिका दरवाजा पीट के हडबडी में चली गयी।"बेटा,नाश्ता करके तो जा" रसोई से मुद्रा ये कहके आने तक राघिका की स्कुटी की ध्वनी क्षीण हो गया था।मुद्रा को राधिका की व्यवहार आज कल अजीब लग रहा था।जो हर माँ बाप को होता है बच्चों की किशोर उम्र में।मन में संदेह की बुंद बडा आकार ले रही थी।"कहीं मेरी बेटी किसी से..." अपने आप से कुछ कहते कहते यकायक से चुप हो गयी मुद्रा।मन की नाव उसे कहीं और लेके जा रही थी।             बिलकुल राधिका की उम्र की ही थी वो। इसी तरह व्यस्त हो कर दौडती थी काॅलेज मानस से मिलने।चुपके चुपके लाइब्रेरी में मिल मिल कर ही उन दोनों का प्रेम परिपक्व हुआ था।हर प्रेमी के तरह वो भी कुछ सोच के अपने आप हसती थी।सबकी तरह वो भी डायरी में गीत की अंतरा लिखती थी,         "पहले भी यूं तो बरसे थे बादल          पहले भी यूं तो भीगा था आँचल              अब के बरस क्यों सजन   ...

ठण्ड बहुत है

दिसंबर का महीना अभी बीता नहीं ठण्ड भी परवान नहीं चढ़ी बर्फ यहाँ वहां बिखरी पड़ी है मुझे याद आता है मुंशी प्रेमचंद का झबरू जो पूस की रात में अपने मालिक से चिपक दूर करता है ठण्ड का कहर और मालिक भी बेखबर फसल के चौपट हो जाने से, अभी बाकि है बुखारी में आग का सुलगना अभी-अभी चूल्हे की आग ठण्डी पड़ी है और वो मूंगफली के स्वाद में भूल गयी है चावल चढ़ाना लकड़ी की सीलन ने बढ़ा दी हैं मुश्किलें अब आग नहीं जलती उठता है धुआं मेरी एक साल की बिटिया कुनमुनाने लगी है सच में दिसम्बर में जनवरी सी ठण्ड है

किवाड़

क्या आपको पता है ? कि किवाड़ की जो जोड़ी होती है, उसका एक पल्ला पुरुष और, दूसरा पल्ला स्त्री होती है। ये घर की चौखट से जुड़े - जड़े रहते हैं। हर आगत के स्वागत में  खड़े रहते हैं। खुद को ये घर का  सदस्य मानते हैं। भीतर बाहर के हर रहस्य जानते हैं।। एक रात उनके बीच था संवाद। चोरों को लाख - लाख धन्यवाद वर्ना घर के लोग हमारी एक भी चलने नहीं देते। हम रात को आपस में मिल तो जाते हैं, हमें ये मिलने भी नहीं देते। घर की चौखट के साथ हम जुड़े हैं, अगर जुड़े जड़े नहीं होते तो किसी दिन तेज आंधी -तूफान आता, तो तुम कहीं पड़ी होतीं, हम कहीं और पड़े होते।। चौखट से जो भी  एक बार उखड़ा है। वो वापस कभी भी नहीं जुड़ा है। इस घर में ये जो झरोखे , और खिड़कियाँ हैं। यह सब हमारे लड़के और लड़कियाँ हैं।। तब ही तो इन्हें बिल्कुल खुला छोड़ देते हैं। पूरे घर में जीवन रचा बसा रहे, इसलिये ये आती जाती हवा को, खेल ही खेल में ,घर की तरफ मोड़ देते हैं। हम घर की  सच्चाई छिपाते हैं। घर की शोभा को बढ़ाते हैं ।   भले कुछ भी खास नहीं ,  पर उससे ज़्यादा बतलाते हैं। इसीलिये घर ...

अगर_भारत_की_सारी_अद्भुत_जगहों_के_बारे_में_लिखूं_तो कविता_नहीं_किताब_बन_जाये ?

सुनो.... मैं कहाँ करूँगी तुमसे uk लंदन जाने की ज़िद मुझे पसंद ही नहीं है दूसरा देश... हम ना बनारस चलेंगे.... घाटों की ढ़लती शामों में.... दोनो पैरों को पानी में डालके.... हम बातें करेंगे ढेर सारी.... और वो जो बिंदी खरीदी थी हमने उस मंदिर वाली दुकान से... मैं लगा के आऊँगी.... फिर दोनों करेंगे आरती .. गंगा मैया की.... हम ना वृन्दावन भी चलेंगे महसूस करेंगे वो ज़िन्दगी.... जो मेरे कान्हा ने राधे के साथ जी होगी.... तुम लगा देना उन फूलों को मेरे बिखरे हुवे बालों में... जो उस पावन धरती पे गिरे होंगे... हम बैठेंगे मधुवन में देखेंगे रास जियेंगे हर ख़्वाब जो कभी राधे ने कृष्ण को दिखाए होंगे और सुनो.... फिर चलेंगे हम वहाँ जिसे ग़ुलाबी शहर कहते हैं अपने प्रीत का रंग भी तो गुलाबी ही है ना मैं क्यूँ कहूँगी तुमसे 5 सितारा होटल की ख़्वाहिश.... हम सड़क के किनारे ढाबे पे बाटी चोखा खाएंगे.... कैपचिनो और जाने क्या क्या पीते हैं लोग हम तुम्हारे साथ टपरी वाली चाय पिया करेंगे हमारे ख़्वाब महंगे नहीं अजीब है हम भारत के हैं.... यहीं की खूबसूरती को निहारते रह जाएंगे❤️❤️❤️ ...

अर्ध रात्रि का ज्ञान

सोचा है कभी आपने ’’अरे! क्या हुआ कल तक तो भले चंगे थे, और आज हार्ट अटैक!’’ मैंने आश्चर्य ये पूछा। ’’दो नंबर का माल भरा पड़ा है पर कहीं लगा नहीं पा रहे हैं, इसलिए बहुत दिनों से टेंशन में चल रहे थे।’’ समीर ने हंसकर कहा। तो मैं आश्चर्य में डूबा रहा क्योंकि मुझे ये समझ ही नहीं आ रहा था कि इतना कितना माल था जो कहीं इनवेस्ट नहीं कर पा रहे हैं। आखिर मैंने पूछ ही लिया। ’’यार! कितना पैसा होगा जो इनवेस्ट नहीं कर पा रहा है ?’’ ’’तुम और हम कल्पना नहीं कर सकते, इतना पैसा है। तनखा लगभग पचास हजार, चाय नाश्ता पानी पेट्रोल, दारू मुफ्त में। इसके बाद कमीशन पांच परसेंट।’’ समीर आंखें बड़ी करके बोला। ’’तो?’’ मेरे मुंह से कोई आश्चर्य प्रगट नहीं हो रहा था। समीर मुझे घूर कर देखता हुआ पूछा। ’’अच्छा! तुम ही बताओं वो सब इंजीनियर कितना कमाता होगा दो नंबर का ?’’ मैं एक पल को सोचा और बोला-’’बीस-तीस-पचास हजार रूपया महीना।’’ मेरी इस बात पर समीर हंस पड़ा और बोला-’’बस यही कमी है हमारे देशवासियों की। वो अपनी कमाई से दूसरों की तुलना करते हैं। जबकि उनकी और देशवासियों की कमाई की कोई तुलना नहीं है।’’ ’’......’’ मैं ...

एक चर्चा हिन्दू संस्कृति की

सुहागन रहो, सौभाग्यवती भव आदि पति के ज़िंदा रहने का आशीष ख़ूब मिलते हैं महिलाओं को, पत्नी जिए-ऐसा कोई आशीष सुना आजतक? सवाल आलोचना का नही, सुधार का है. हम पहले भी बदलते रहे हैं, अब भी बदलें। हमारी संस्कृति एक विज्ञान है जिसमें श्रेष्ठतम को स्थान दिया जाता है। और श्रेष्ठतम भी कैसा ? ऐसा श्रेष्ठ जो किसी अन्य को नुकसान न पहुंचाये, सिर्फ और सिर्फ अपना ही काम करे। सर्वे भवन्तु मंगलम! हमारे कृत्य से जो उद्देश्य लिया है वो तो पूरा हो जाये और उसके साथ ही किसी अन्य का नुकसान न हो भले ही लाभ हो जाये। ग़ौर कीजिए न- पुरुषों को भी गाली अगर दी जाय तो वह महिलाओं की ही होती है. इसके उलट महिलाओं को भी आशीर्वाद दिया जाय तो वह पुरुषों के लिए ही होता है. क्या यह सही है? क्या इन छोटे-छोटे बदलावों पर हमें ध्यान नही देना होगा? बदलना नही चाहिए हमें? सच ही तो है ये बात! हमें अपने समाज में ऐसी विरोधाभासी चीजों को ढूंढ ढूंढ कर नष्ट किये जाने की आवश्यकता है। और भी बहुत सी बातें हैं जिनके विरोध की आवश्यकता है। यहां एक बात विचारणीय है कि आज हम बहुत सी बातों को जानने का दावा करते हैं, क्या हम आज अपनी पढ़ाई में प...

35 वर्ष पहले मेरे बचपन की दिवाली

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आज का भ्रम और बचपन की हकीकत 35 वर्ष पहले गाँव का जीवन उतना ही सरल था जितना ग्रामीण संस्कृति की विशेषता बताने वाले समाजशास्त्री अपनी किताबों में लिखते हैं। इस सरल ग्रामीण जीवन में बच्चों का बचपन और भी ज्यादा मासूम था। दिवाली की जैसी उत्सुकता आज के बच्चों में है, वैसी हम में नहीं थी, क्योंकि मिट्टी के बने हमारे कच्चे घर में इस दिन न नये वस्त्र पहने का रिवाज था, न पकवान बनाने का और न ही पटाके फोड़ने का। इस दिन सुबह दादाजी अपने प्रतिदिन की दिनचर्या से हटकर सबसे पहले स्नान कर लेते थे और दादीजी गेंहू के दलिये की खीर (क्योंकि पैसों के अभाव में चावल खरीदना मुश्किल होता था) बनाने का उपक्रम शुरू कर देती थी। हम बच्चे उस घड़ी का इंतजार करते थे जब दादाजी उस खीर का भोग हमारे पितृ देवों को चढ़ाते थे, ताकि प्रसादस्वरूप हमें खीर खाने को मिल सके। पेट भर जाने के बाद भी बालमन को तृप्ति नहीं होती थी तो गाँव के और लोगों के पितृ देवों के चबूतरों पर दौड़कर पहुँच जाते थे, जहॉ पीपल के पत्तों पर और खीर खाने का मौका मिल जाता था। हमारे लिए दिवाली का दिन पितृ देवों के लिए बनी अमावस्य की खीर के स्वाद का आनंद लेत...

लंका-विजय के बाद

तब भारद्वाज बोले, "हे ऋषिवर, आपने मुझे परम पुनीत राम-कथा सुनाई, जिसे सुनकर मैं कृतार्थ हुआ। परन्तु लंका-विजय के बाद बानरो के चरित्र के विषय में आपने कुछ नहीं कहा. अयोध्या लौटकर बानरों ने कैसे कार्य किए, सो अब समझाकर कहिये." याज्ञवल्क्य बोले, "हे भारद्वाज, वह प्रसंग श्रद्धालु भक्तों के श्रवण योग्य नहीं है। उससे श्रद्धा स्खलित होती है. उस प्रसंग के वक्ता और श्रोता दोनों ही पाप के भागी होते हैं." तब भारद्वाज हाथ जोड़कर कहने लगे, "भगवन, आप तो परम ज्ञानी हैं। आपको विदित ही है कि श्रद्धा के आवरण में सत्य को नहीं छिपाना चाहिए. मैं एक सामान्य सत्यांवेशी हूँ. कृपा कर मुझे बानरों का सत्य चरित्र ही सुनाईए." याज्ञवल्क्य प्रसन्न होकर बोले, "हे मुनि, मैं तुम्हारी सत्य-निष्ठा देखकर परम प्रसन्न हुआ. तुममें पात्रता देखकर अब मैं तुम्हें वह दुर्लभ प्रसंग सुनाता हू, सो ध्यान से सुनो." इतना कहकर याज्ञवल्क्य ने नेत्र बंद कर लिए और ध्यान-मग्न हो गए। भारद्वाज उनके उस ज्ञानोद्दीप्त मुख को देखते रहे. उस सहज, शांत और सौम्य मुख पर आवेग और क्षोभ के चिन्ह प्रकट होन...

जाया करो गरीबों की बस्ती में भी कभी-कभी...!!! *कुछ भी नहीं तो शुक्र-ए-खुदा सीख जाओगे....!!!

जिनके पास अपने हैं, वो अपनो से झगड़ते हैं, जिनका कोई नहीं अपना, वो अपनो को तरसते हैं कल न हम होगे न गिला होगा, सिर्फ सिनटी हुई यादो का सिलसिला होगा, जो लम्हें हैं चलो हंसकर बिता ले, जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा!! शरीर की सुंदरता महत्वपूर्ण नहीं हैं, कर्म सुन्दर होने चाहिए, हमारे विचार हमारी वाणी, व्यवहार, संस्कार और हमारा चरित्र सुंदर होना चाहिये, जो जीवन में कर्म सुन्दर करता हैं, वही इंसान दुनिया का सबसे सुंदर शख्स हैं और जमाना भी उनका ही दीवाना हैं....!! विचार बहता हुआ पानी हैं, यदि इसमें आप, गंदगी मिलाएंगे तो वो, गंदा नाला बन जायेगा! और सुगंध मिलाएंगे तो फिर, वही गंगाजल कहलायेगा!! किसी ने पूछा कि उम्र और जिंदगी, में क्या फर्क हैं? बहुत सुंदर जवाब... जो अपनो के बिना बीती वो उम्र, और जो अपनो के साथ बीती वो जिंदगी हैं!! बदलता वक्त..... और बदलते लोग..... किसी के भी नहीं हुआ करते.....! सच्चा व्यक्ति ना तो नास्तिक होता हैं.... ना ही आस्तिक होता हैं..... सच्चा व्यक्ति हर समय वास्तविक होता हैं....!! आँसू न होते जो आँखे इतनी खुबसूरत न होती, दर्द न ...

मैया, माई, "माँ" ।

लेती नहीं दवाई "माँ", जोड़े पाई-पाई "माँ"। दुःख थे पर्वत, राई "माँ", हारी नहीं लड़ाई "माँ"। इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागर्म रजाई "माँ" । जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई "माँ" । बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई "माँ"। बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई "माँ"। बाबूजी के पाँव दबा कर सब तीरथ हो आई "माँ"। नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, "माँ" । सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई  "माँ" । घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई "माँ"। बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई "माँ" । रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई "माँ"। लड़ते-लड़ते, सहते-सहते, रह गई एक तिहाई "माँ" । बेटी रहे ससुराल में खुश, सब ज़ेवर दे आई "माँ"। "माँ" से घर, घर लगता है, घर में घुली, समाई "माँ" ।...

Life_in_a_metro

अक्टूबर के महीने में शहर बदल सा जाता है.. रात के वक़्त दूधिया रोशनी से नहायी खाली सड़कें.. किसी ऑफिस के बाहर सड़क के किनारे देर रात तक खुलने वाली चाय की टपरी पर गले मे i-कार्ड लटकाये अपनी ही दुनिया में खोये हुए चार दोस्त.. भीनी भीनी सी किसी खास फूल/पौधे से आती सुगंध.. हल्का सा ठंड का अहसास.. और चारों तरफ फैले सन्नाटे के बीच कभी कभी किसी गाड़ी के गुजरने की आवाज़.. मन करता है कुछ गुनगुनाते हुए ड्राइव करें.. फिर लगता है कि FM पर ही किसी जॉकी को क्रिएटिव होने का काम आउटसोर्स करके उसकी ही बातें सुनें.. समान्यतः इस महीने में दुनियादारी की दिक्कतें कम होती है.. और मिजाज फेस्टिव होता है.. न अप्रेजल का युद्ध.. न फीडबैक का चकल्लस.. शायद सबसे कम रेसिग्नेशन इसी महीने पड़ते होंगे.. हल्की सी ठंडी हवा जब हाफ स्लीव टी शर्ट से टकराती है.. तब अवचेतन मन में अपने आप दीवाली का अहसास होने लगता है.. और जब दीवाली की बात होती है.. तो कभी ये शहर याद नहीं आता जहां रोजी रोटी की तलाश में बसे हैं.. याद आता है वो घर..जहाँ होश संभालते ही दीवाली मनायी थी.. दीवाली के नाम पे अब बस पटाखे चलाने या न ...

अत्यंत लघु कथा

✍ एक वृद्धाश्रम में *दो समधन* मिली .. कौन किसको दोष दे ? 🙏

बिना दहेज़ के

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, उसके चहरे पर पहले तो बिल्कुल मासूम सी मुस्कराहट फैल जाती है, फिर वह मुस्कराहट उदासी में बदलते हुए पलकों पर अश्रु के बूँदों के रूप में नज़र आने लगती है। फिर थोड़ा नाख़ुश सा होकर कहती है, मैँ कहती थी ना पुरानी बातें तकलीफ़ देती है, ना जाने क्यों तुम हमेशा गुजरे ज़माने की बातें करते हो? उसने बताया कि वह बचपन में बहुत शरारती थी, घर में सबसे छोटी थी तो सबकी लाडली भी थी। निश्चय ही वह बचपन में बहुत खूबसूरत और चंचल रही होगी। उसके दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनें है।बहुत कहने पर उसने अपनी संक्षिप्त आपबीती सुनाई, उसने बताया कि जब वह बारहवीं कक्षा में थी तो उसके घर पर उसके छोटे भैया का दोस्त आया करता था, परिवार में सब लोग उसके व्यक्तित्व और व्यवहार से प्रभावित थे। वह अक्सर छोटे भैया के साथ ही आता और हल्का - फुल्का चाय नाश्ता करके फिर भैया के साथ ही चला जाता था। पहली बार जब मैं उनदोनों को चाय देने गई तो वह लड़का मुझे बहुत ही उदास नजरों से देर तक देखता रहा था। धीरे - धीरे उसका घर पर आना - जाना बढ़ गया था, मुझे भी वह अच्छा लगता था मगर हमारे बीच एक - दूसरे को देखने के अलावा ...

बेटी पढ़ाओ बेटी ।

पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए  गिद कर रही थी ।  “किस भाव से दिए भाई?” पापा ने सवाल किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया…… पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है….जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। . पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने। यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब… अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे माँग पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी…. जिसकी शादी उसने तीन साल पहले एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी…… उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी छोटी बातों प...

अनोखी ससुराल

तीज का त्यौहार आने वाला था। तुलसी जी की दोनों बहुओं के मायके से तीज का सामान भर भर के उनके भाइयों द्वारा पहुंचा दिया गया था। छोटी बहू मीरा का यह शादी के बाद पहला त्यौहार था। चूँकि मीरा के माता पिता का बचपन में ही देहांत हो जाने के कारण, उसके चाचा चाची ने ही उसे पाला था इसलिए और हमेशा हॉस्टल में रहने के कारण उसे यह सब रीति-रिवाजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। पढ़ने में होशियार मीरा को कॉलेज के तुरंत बाद जॉब मिल गई। आकाश और वो दोनों एक ही कंपनी में थे। जहां दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया और घरवालों ने भी बिना किसी आपत्ति के दोनों की शादी करवा दी। आज जब मीरा ने देखा कि उसकी जेठानियों के मायके से शगुन में ढ़ेर सारा सुहाग का सामान, साड़ियां, मेहंदी, मिठाईयां इत्यादि आया है तो उसे अपना कद बहुत छोटा लगने लगा।मायके के नाम पर उसके चाचा चाची का घर तो था, परंतु उन्होंने मीरा के पिता के पैसों से बचपन में ही हॉस्टल में एडमिशन करवा कर अपनी जिम्मेदारी निभा ली थी और अब शादी करवा कर उसकी इतिश्री कर ली थी। आखिर उसका शगुन का सामान कौन लाएगा, ये सोच सोचकर मीरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। जेठानियो...

स्त्रियों_को_समर्पित

एक स्त्री द्वारा लिखित बेहद संवेदनशील और अन्दर तक झकझोरने वाला लेख..😢 मुझे याद नहीं कि बचपन में कभी सिर्फ इस वजह से स्‍कूल में देर तक रुकी रही होऊं कि बाहर बारिश हो रही है ना। भीगते हुए ही घर पहुंच जाती थी और तब बारिश में भीगने का मतलब होता था, घर पर अजवाइन वाले गर्म सरसों के तेल की मालिश और ये विदाउट फेल हर बार होता ही था। मौज में भीगूं तो डांट के साथ-साथ सरसों का तेल हाजिर। फिर जब घर से दूर रहने लगी तो धीरे-धीरे बारिश में भीगना कम होते-होते बंद ही हो गया। यूं नहीं कि बाद में जिंदगी में लोग नहीं थे। लेकिन किसी के दिमाग में कभी नहीं आया कि बारिश में भीगी लड़की के तलवों पर गर्म सरसों का तेल मल दिया जाए। कभी नहीं। ऐसी सैकड़ों चीजें, जो माँ हमेशा करती थीं, माँ से दूर होने के बाद किसी ने नहीं की। किसी ने कभी बालों में तेल नहीं लगाया। माँ आज भी एक दिन के लिए भी मिले तो बालों में तेल जरूर लगाएं। बचपन में खाना मनपसंद न हो तो माँ दस और ऑप्‍शन देती। अच्‍छा घी-गुड़ रोटी खा लो, अच्‍छा आलू की भुजिया बना देती हूं। माँ नखरे सहती थी, इसलिए उनसे लडि़याते भी थे। लेकिन बाद में किसी ने इस त...
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प्रेमिका मरती नही है सिर्फ दफन हो जाया करती है प्रेमी की गुमनाम चिट्ठियों में जिन्हें लिखा जाता है सफेद रंग की स्याही से,या फिर रह जाती है उसके कमरे में पड़ी किसी किताब के पन्ने में, वो किताब जो सदियों पहले जला दी गयी थी, वो नजर आती है सिगरेट के उड़ते धुंए में और गुम हो जाती है किसी के पैरों तले दब कर उसी आधी सिगरेट की तरह,उसके हाथों की मेहंदी का रंग पीला पड़ चुका होता है वो दूर से देखती है उसकी मोहोब्बत को किसी आवारा के गले लगते हुए, वो चाहती है ज़ोर से चीखना , वो तड़पती है खुद को प्रेमी की बाहों में भरकर सो जाना चाहती है, प्रेमिका कभी मरती नही बस खो जाया करती है चार दीवारी अंधेरो में जहाँ सिर्फ उसके प्रेमी की सांसो की ही आवाज होती है जहां उसका जिस्म आहिस्ते आहिस्ते रूह से दूर हो जाएगा, जहाँ इस दुनिया के कानून काम न आएंगे और जहाँ एक बार फिर दो लबो का मिलन होगा, ठीक उस जगह प्रेमी तोड़ चुका होगा अपना दम और वो दोनों एक लाल चादर में लिपटे जिंदगी की तमाम रातें गुजार देंगे , जहाँ जन्म होगा एक नए इश्क़ का जो लिखेगा चिट्ठियां , और दफन कर देगा एक बार फिर से प्रेमिका को जो जिंदा है ।

वो खुशनसीब दोनों थकते नहीं।

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सुबह उठकर वो रोटियाँ समेटती है कागज़ में, साथ में लेती है सालन ज़रा सा, ज़रा सी आम की चटनी भी। फिर अपने बच्चों को तैयार करती है स्कूल भेजने के लिए, अपनी बेटी के माथे से तेल पोंछती है अपनी सारी के पल्लू से, चूल्हा चौखट करने में उस औरत की सुबह ख़त्म होती है। तबतक उसका मर्द सजाता है अपना कारोबारी ठेला, फिर दोनों साथ-साथ निकलते है आनेवाले कल की रोटी के लिए। रास्ते में जाते हुए जब वो कुछ अपनी बातें करना शुरू करते है, उस औरत की चूड़ियाँ फिर बैकग्राउंड म्यूज़िक पेश करती है। उपर से उड़कर तितलियाँ उनपर रंग बिखेरती है जैसे, पेड पौधे भी फिर झुकते है और साया करने लगते है। दूसरे गांव पहुंचने तक वहां से शाम को लौटने तक भी, ताज़्जुब ये है कि वो खुशनसीब दोनों थकते नहीं। शाम जब घर आते है तो टूटी-फूटी दहलीज़ को सिनें से लगा लेते है अपने दोनों बच्चों के लिए वो खिलौने के तौर पर एक हँसी और थकान लाए होते है। वो कभी भी अपने इन  हालातों से डरे नहीं है आपस में किसी इच्छाओं के लिए लड़े नहीं है

मकान

        मकान इंट पत्थर से नहीं बनता। मकान तो इश्क़ से बनता है । खट्टी मिठी तकरारों से बनता है । प्यार से पकाइ   रसोई में पनपता है । फ्रिज से पानी निकालने के बहाने किये पीछे से आलिंगन से बनता है ।छत पे कपड़े सुखाने गयी अपनी चाँद के पीछे- पीछे दवे पावँ चलने से बनता है।                  हमारा मकान भी कुछ ऐसे ही बना था धीरे धीरे।इश्क़ पल दर पल बढता गया और हमारा मकान रफ्ता रफ्ता बनता गया।अंजान सफर से, मिलके सफर करने तक सारी झिझक मिट गइ थी।बिना देखे शादी करने से, बस देखते रहके जिंदगी बिताने तक का सफर आँच की तरह था हमारे लिए।पर अच्छा हुआ।प्रेम पक पक के परिपक्व बना और हमारा मकान एक संपूर्ण घर बन गया।कुछ हिस्से उसकी रूह ने बनाए , हाँ तब , जब मैं उसका माथा चुम के उसकी आँखें निहार रहा था।कुछ हिस्सें मेरे अनाविल प्रेम ने बनाए , हाँ तब, जब वो दर्पण में अपनी बिंदी चिपकाए मेरे लिए सवर रही थी।कुछ हिस्सें उसके पनघट के आढ के इंतजार ने बनाए और कुछ हिस्सें मेरे डटे हुए कर्त्तव्य ने।बाकी कुछ हिस्सें तब बन गये थे जब उसने नजरें लड...

मेरा किस्सा

बारिश...कल, आज, कल। देखो जब बारिश होती है ना तो तुम बहुत याद आते हो, हालांकि हमारी ऐसी कोई खास याद नहीं जो बारिश से जुड़ी हो, फिर भी...जब बारिश होती हैं तो तुम्हारी कमी सबसे ज्यादा खलती है... शायद इसलिए क्यूंकि तुमसे प्यार का इजहार इसी मौसम में किया था, तुम्हे देखने की बेचैनी हा ये एहसास भी पहली बार इसी मौसम की ही तो देन है, कैसे देर रात अपने घर के बंद दरवाजों की कनखियो से तुम्हारी एक झलक देखने का इंतज़ार होता था, उस लोहे के दरवाजे से अपने गाल टिकाए जैसे उस दरवाज़े की ठंडक भी तुम्हारे प्यार का एहसास हो...याद है एक बार मुझसे बाते करते वक़्त तुम टहलते टहलते घर से कुछ दूर निकल आए और बारिश के कारण रात ३ बजे तक एक दुकान के टीन शेड के नीचे तुम मुझसे फोन पर बतियाए...वो भी एक अलग ही वक़्त था...एक शब्द में परिभाषित करना हो तो ''खूबसूरत" ... बारिश में तुम्हारा बार बार बीमार होना और उस पर मेरा डांट लगाना के तुम खुद का बिल्कुल खयाल नहीं करते...और इस पर भी तुम्हारा और भी लापरवाह होजाना वो भी तो अनकहा इश्क़ ही था,... अच्छा याद करो इस मौसम में जब भी तुमसे मिलने आती और जब मेरे जाने के...

मेरे मन का विचार

सभ्यता के नाम पर हमारे पास है क्या ?? " न ढ़ोल बजते हैं ,   न मंजीरा बजता हैं ,,   न कोई नाचने की क्षमता रह गयी हैं ; पैर ही नाचना भूल गये हैं ।       हम ने लिखा हैं कि उस रात पूरे चांद के नीचे , वृक्षों के नीचे नाचते हुए गाँववाले को देखकर , मेरे मन में यह सवाल उठा कि हमने पाया क्या हैं , प्रगति के नाम पर ??          लोग हमे समझेगे पागल हो गयी हैं ।     लोग दुख को तो समझते हैं स्वास्थ्य , और आंनद को समझते हैं विक्षिप्तता । हालतें इतनी बिगड़ गयी हैं कि इस दुनिया में केवल पागल ही हंसते हैं ,,,,,,, बाकी ...... , समझदारों को तो हंसने की फुर्सत कहाँ हैं. ?? " समझदारों के ह्रदय को सूख गये हैं , समझदार रूपये गिनने में उलझे हैं , समझदार महत्वाकांक्षी की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं । समझदार तो कहते हैं दिल्ली चलो । फुर्सत कहाँ हैं हंसने की , दो गीत गाने की , इकतारा बजाने की , तारों के नीचे वृक्षों की छाया में नाचने की , सूरज को देखने की , फूलों से बात करने की , वृक्षों को गले लगाने की , फुर्सत किसे है ??     " ...

#एक_सुंदर_सी_कहानी........💞

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"रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें, माता_पिता जैंसे सास, ससुर और एक छोटी सी नंनद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहा था,           आज रेनू बीतें दिनों को लेकर बैठी थी, कैंसे उसके पिताजी नें बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था,         खैर बात ये नही थी, बात तो ये थी की  रेनू के बड़े भाई ने, अपने माता_पिता को घर से निकाल दिया था। क्यूँकी  पैसें तो उनके पास बचें नही थें, जितने थें उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थें, फिर भला बच्चें माँ बाप को क्यूँ रखने लगें।  रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थें ।😧😧 रेनू आज उनसे मिल के आयी थी, और बड़ी उदास रहने लगी थी। आखिर लड़की थी, अपने माता_पिता के लिए कैसे दुख नही होता, कितने नाजों से पाला था, उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था । आज वह...

मिडल_क्लास_के_लड़के

पढ़ना कुछ और चाहते हैं, पढ़ाया कुछ और जाता है...बन कुछ और जाते हैं ! पसन्द किसी और को करते हैं, प्यार किसी और का मिलता है शादी किसी और से हो जाती है ! चाय बना लेते हैं....बनानी पड़ती है... कर्ज़ लेने और देने में जरा सी भी देरी नही करते ! रिश्तेदारों को शहर घूमाने की जिम्मेदारी यही निभाते हैं ! 4जी फोन लेने में इन्हें साल भर लगता है ! गैस भरवाने की जिम्मेदारी, सुबह दूध और शाम की सब्जी लाने जैसा कठिन और दर्दनाक काम भी यही करते हैं ! खुद की प्रेमिका की शादी में 'नागिन डांस' करने का गौरव केवलः इन्हें ही प्राप्त है ! आइसक्रीम की टेस्ट से इन्हें शादी में हुए खर्चों का अंदाजा लग जाता है ! लुसेंट इनकी जिंदगी में उस गर्लफ्रेंड की तरह होती है जो साथ तो रहती है लेकिन समझ कभी नही आती ! रीजनिंग के प्रश्न चुटकी में हल कर देने वाले ये मिडल क्लास लड़के खुद की जिंदगी की समस्याओं में उलझे रह जाते हैं ! घर और अपनी 'जान' से किसी लायक बनने का वादा करके निकले ये मिडल क्लास लड़के जब तक लायक हो के घर लौटते हैं...तब तक उनकी जान 'दो चार जानों' की 'जननी' बन चुकी होती...

मेरी बिटिया बड़ी हो गयी।

मेरी बिटिया बड़ी हो गयी। एक रोज उसने बड़े सहज भाव में मुझसे पूछा---" पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया ?? " मैंने कहा---" हाँ। " " कब ? "---उसने आश्चर्य से पूछा। मैंने बताया---" उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं। मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो। तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं। जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद। मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था। मुझे तुम्हारा चुनाव देखना था। तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा तुम्हें देख रहा था। तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं श्वांस रोके तुम्हें देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर मेरी गोद में बैठ गयीं। मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी त...

MOTIVATION

पाना है जो मुकाम वो अभी बाकी है, अभी तो आये है ज़मीन पे अभी तो आसमान की उड़ान बाकी है..।

भारत का मुस्लमान

भारत का मुस्लमान... मैं देश के बहुत हिस्सों में तो नहीं गया लेकिन कई हिस्सों, कई शहरों में रहने का मौका मुझे जरुर मिला है. मैं आज एक दम से तो 35-36 साल का नहीं हुआ इसमें भी कुछ वक़्त लगा है. मैं आज 35 सालों के दौरान लगभग सैकड़ों मुस्लिम मित्रों, सहपाठियों, सहभागियों के साथ पढ़ा लिखा काम किया लेकिन इन 35 सालों में मुझे वैसा कुछ नहीं दिखा जो हम सब आज इस 21वीं सदी के मोबाइल युग में देख कर पल बढ़ रहे हैं. मैंने किसी भी मुसलमान को हिन्दू धर्म का समर्थक तो नहीं पाया लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं देखा जिससे ये लगे कि उनको मेरे हिन्दू होने के कारण मुझसे किसी प्रकार का बैर है. मुझे कभी उनके खानों में अपनी रसोई जैसे मसालों जैसा स्वाद तो नहीं मिला लेकिन कभी ऐसा भी प्रतीत नहीं हुआ की उनके भोजन में पानी की जगह खून मिलाया गया हो. मैंने उन्हें कट्टर भी नहीं पाया कि वे मुझसे कहते कि राम को छोड़ दो और खुदा को अपना लो. कहते भी तो कैसे क्योंकि मैंने भी कभी नहीं कहा की खुदा को छोड़ दो और राम को अपना लो. मैंने कभी भी यह भी नहीं देखा की उनकी नाक, आँख, कान या बनावट किसी अन्य धर्म के इंसान से भिन्न हो हाँ यह जरुर ...

भाई

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नन्हें-नन्हें पाँव थे फिर भी अपने पाँव खड़ा हो गया एक भाई देखो अपनी बहन के लिए माँ जितना बड़ा हो गया...!!

आप ने कभी कैंची चलाई है ?

यह वह दौर था जब टीवी चैनल्स के मामले में बस डीडी नेशनल और डीडी न्यूज़ हुआ करते थे! और धारावाहिक के नाम पर "रामायण" "महाभारत" "श्री कृष्णा" और "शक्तिमान" हुआ करता था। यह दौर था हमारे साइकिल सीखने का और हमारे जमाने में साइकिल दो चरणों में सीखी जाती थी पहला चरण कैंची और दूसरा चरण गद्दी....... तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस बाबा या ताऊ चलाया करते थे तब साइकिल की ऊंचाई अड़तालीस  इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था। "कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे । और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और "क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की छोरा साईकिल दौड़ा रहा है । आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से मरहूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में अड़तालीस इंच ...

बचपन का जमाना होता था

बचपन का जमाना होता था खुशियों का खजाना होता था चाहत चांद को पाने की दिल तितली का दीवाना होता था खबर ना थी सुबह की ना शामो का ठीकाना होता था थके हारे स्कूल से आते पर खेलने भी जाना होता था पापा की वो डांत गलती पर मम्मी का मनाना होता था दादी की कहानी होती थी परियो का फसाना होता था अब नहीं रहा वैसा जैसा बचपन का जमाना होता था...

"चाय पियेंगे..?"

जब कोई पूछता है "चाय पियेंगे" तो बस नहीं पूछता वो तुमसे दूध, चीनी और चायपत्ती को उबालकर बनी हुई एक कप  चाय के लिए। वो पूछता हैं... क्या आप बांटना चाहेंगे कुछ चीनी सी मीठी यादें कुछ चायपत्ती सी कड़वी दुःख भरी बातें..! वो पूछता है.. क्या आप चाहेंगे बाँटना मुझसे अपने कुछ अनुभव, मुझसे कुछ आशाएं कुछ नयी उम्मीदें..? उस एक प्याली चाय के साथ वो बाँटना चाहता है अपनी जिंदगी के वो पल तुमसे जो अनकही है अबतक दास्ताँ जो अनसुनी है अबतक वो कहना चाहता है.. तुमसे तमाम किस्से जो सुना नहीं पाया अपनों को कभी.. एक प्याली चाय के साथ को अपने उन टूटे और खत्म हुए ख्वाबों को एक बार और जी लेना चाहता है। वो उस गर्म चाय की प्याली के साथ उठते हुए धुओँ के साथ कुछ पल को अपनी सारी फ़िक्र उड़ा देना चाहता है इस दो कप चाय के साथ शायद इतनी बातें दो अजनबी कर लेते हैं जितनी तो अपनों के बीच भी नहीं हो पाती। तो बस जब पूछे कोई अगली बार तुमसे  "चाय पियेंगे..?" तो हाँ कहकर बाँट लेना उसके साथ अपनी चीनी सी मीठी यादें और चायपत्ती सी कड़वी दुखभरी  बातें... क्यों...

ब्रह्म

 ब्रह्म . . .हम लोग युगों से ‘ब्रह्म’  शब्द पढते, सुनते और बोलते आए है ! क्या आपको  मालूम है कि ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ  क्या होता है ? यह कैसे बना,...कैसे अस्तित्व में आया..? सबसे पहले  बेसिक बात  जाननी  ज़रूरी  है, सो  उसके बारे  में बताना  चाहूँ .ब्रह्म शब्द ‘'वृह'’ धातु से बना है जिसका अर्थ है - वृहत होना,  बढ़ना, फैलना, विस्तृत होना। ऋषियों- मुनियों ने कहा - ‘ब्रह्म-पार ब्रह्म’.....जिसका अर्थ है - विस्तृत होना या फैलना अर्थात्  जो निस्सीम है !  एक शब्द है – ‘परब्रह्म’   जिसका शाब्दिक अर्थ है 'सर्वोच्च ब्रह्म' - वह ब्रह्म जो सभी वर्णनों और संकल्पनाओं से भी परे है। लगभग सभी  धर्मों मे  ईश्वर  के भिन्न-भिन्न रूपों को  महान, सर्वोच्च  कहा  गया है ।  जैसे - तकबीर, वाक्यांश  "अल्लाहु अकबर"  का अर्थ  है  -  "अल्लाह बहुत बडा है" यानी  "ईश्वर महानतम है"। .युगों पहले निरंतर खोज में लगे, भारतीय जिज्ञासु, ऋषियों- मुनियों ने अनुसंधान कर जिसे पा...

*एक कटु सच्चाई, समाज की आंखे खोलती दो काल्पनिक पत्र, जो कि आगामी दिनों में सत्य प्रतीत होगा*

अवश्य पढ़े आज मार्केट की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के मद्देनजर *पहला पत्र* *आदरणीय महानुभाव* *आपके के यहां विवाह में आना हुआ* , *आपने भोजन में नाना प्रकार के विभिन्न प्रदेशों के 100 से अधिक व्यंजन रखे थे । यह भी सुना कि आपने देश के सुप्रसिद्ध केटरिंग वालों को 2,000 से 2,500/- प्रति प्लेट से अनुबंध किया हैं* *खाने के इतने सारे काउंटर देखकर सभी की आँख फटी रह गयी । chinese, साउथ इंडियन, इटालियन , मैक्सिकन, पंजाबी,राजस्थानी,गुजराती , थाई फूड इसके अलावा आपने आइस क्रीम, बर्फ के गोले, विभिन्न फ्लेवर वाले पान के स्टाल और 25-30 तरह की मिठाई काउंटर भी लगाए थे।* *भाईसाहब, क्षमा करना पिछले कुछ दिनों से मैं और परिवार वाले अक्सर घर से ही खाना खाकर जाते हैं , अतः आपने जो इतनी महंगी और भव्य भोजन व्यवस्था की उसका मैं लाभ नहीं ले सका।* *आपको बुरा न लगे तो एक बात पूछना चाहता हूं , इतनी महंगी और आलीशान भोजन व्यवस्था किसके लिए की ? आपकी प्रतिष्ठा और हैसियत समाज में पहले ही काफी अच्छी हैं ।*  *आपका निश्चित तौर पर पर उद्देश्य लोगों को उनकी मनपसन्द चीजे खिलाने के रहा होगा परन्तु उस दिन शादी क...

चुनौतियों का सामना कीजिए

एक बार एक किसान परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया । कभी बाढ़ आ जाये , कभी सूखा पड जाए , कभी धूप बहुत तेज हो जाए , तो कभी ओले पड जाये ! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी खराब हो जायें ! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से कहा देखिए प्रभु , आप परमात्मा हैं , लेकिन लगता हैं , आपको खेती बाड़ी की ज्यादा जानकारी नही हैं , एक प्रार्थना हैं कि एक साल मुझे मौक़ा दीजियें , जैसा मैं चाहू वैसा मौसम हो , फिर आप देखना मैं कैसे अन्य के भण्डार भर दूंगा ! परमात्मा मुस्करायें और कहा ठीक हैं जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा , मैं दखल नही करुँगा ! किसान ने गेहूँ की फसल बोई जब धूप चाही, तब धूप मिली , जब पानी , तब पानी , तेज धूप , ओले , बाढ़ , आँधी तो उसने आने ही नही दी , समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की खुशी भी ,क्योंकि ऐसी फसल तो आज तक नही हुई थी ! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा परमात्मा को , कि फसल कैसे करते हैं, बेकार ही इतने बरस हम किसानों को परेशान करते रहें , फसल काटने का समय भी  आया , किसान बड़े गर्व से फसल काटने गया , लेकिन  जैसे ही फसल काटने लगा , एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया ...

मेरी माँ

मेरी माँ !!!!!!!!!!!!!! लेती नही दवाई " माँ " जोडे पाई पाई " माँ " । दुख थे पर्वत , राई " माँ " हारी नही लड़ाई "माँ "। इस दुनिया में सब मैले हैं , किस दुनिया से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे , गरमागर्म रजाई " माँ "। जब भी कोई रिश्ता उधड़े , करती हैं तुरपाई " माँ " । बाबूजी के पांव दबा कर , सब तीरथ हो आई " माँ "। नाम सभी हैं गुड़ से मिठे , माँ जी , मैया , माई " माँ "। सभी साड़ियाँ छीज गई थी , मगर नही कह पाई " माँ "। घर में चूल्हे मत बाँटों रे , देती रही दुहाई " माँ " । बाबूजी बीमार पडे जब , साथ साथ मुरझाई " माँ " । रोती हैं लेकिन छुप छुप कर , बड़े सब्र की आई " माँ "। लड़ते लड़ते , सहते सहते , रह गई एक तिहाई " माँ " । बेटी रहे ससुराल में खुश , सब जेवर दे आई " माँ "। " माँ " से घर , घर लगता हैं , घर में घुली समाई " माँ " । बेटे की कुर्सी हैं ऊँची , पर उसकी ऊँचाई " माँ ...

यदि सिंह अहिंसक हो जाये

यदि सिंह अहिंसक हो जाये, गीदड़ भी शौर्य दिखाते है, जब गरूड़ संत सन्यासी हो, तब सर्प पनपते जाते है | इस शांति अहिंसा के चक्कर मे अपना विनाश आरम्भ हुआ | जब से अशोक ने शस्त्र त्यजे, भारत विघटन प्रारम्भ हुआ |

लघुकथा--बेटी का बाप

। गुप्ता जी ने जैसी ही पंडाल में अपने बेटे को कई लोगों के साथ बहस करते देखा तो दौड़कर पंडाल की तरफ भागे। "क्या हुआ बेटा सोनू, शोर क्यों मचा रहा है?" गुप्ता जी ने बड़े हैरानी से अपने बेटे से पूछा। "देखिये ना पिताजी, मुझे कोल्ड ड्रिंक पीना है और ये लड़की वाले कह रहे हैं कि कोल्ड ड्रिंक खत्म हो गया।" सोनू ने गुस्से भरे स्वर में जवाब दिया। गुप्ता जी अपने बेटे को समझा ही रहे थे कि इतने में बेटी का बाप आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला। "माफ करना बेटा, कोल्ड ड्रिंक खत्म हो गयी है, लेने के लिए भेजा है। अभी थोड़ी देर में आ जायेगी।" गुप्ता जी से रहा नहीं गया। उन्होंने तुरंत उनका हाथ पकड़कर बोला। "रहने दीजिए समधी जी। शादी में कम ज्यादा होता रहता है। आपको कोल्ड ड्रिंक मंगाने की कोई जरूरत नहीं है। मैंने भी पिछले वर्ष अपनी बिटिया की शादी की थी। मैं समझ सकता हूँ। मैं भी एक बेटी का बाप हूँ।" अग्रवाल जी अपने आँसू नहीं रोक पा रहे थे। सोनू शर्मिदा होकर वहाँ से चला गया।

बीवी रेलवे वाले की... .व्यंग्य का आनंद लें.

हाय राम हमारी किस्मत तो, लगता है एकदम सो गई है; जबसे मेरी शादी, एक अध्यापक जी से हो गई है। सुबह 7 बजे घर से निकलें, ढाई बजे आ जाते हैं; घर पड़े पड़े फिर पूरा दिन वह, मुझपे हुकुम चलाते हैं। भगवान बनाया क्यों मुझे, एक बीवी टीचिंग वाले की; अगले जनम मे मुझे बनाना, बीवी रेलवे वाले की।। और ऊपर से पोसटिंग, हो जाए उनकी रोडसाइड मे; सच कहती हूँ राज करूँगी, बिना तख़त बिन ताज के। सुबह के निकले सैँया जी, देर रात घर आएंगे; बिना किसी झगड़े दंगे, दो पैग लगा सो जाएंगे। गजब निराली माया होगी, व्हिस्की औ रम के प्याले की; अगले जनम मे मुझे बनाना, बीवी रेलवे वाले की।। रेलवे वाले जीवन जीते, पत्नी संग रोमाँस मे; आधी सैलरी खर्च करें, पत्नी के मेंटिनेन्स मे। पतिदेव की सर्विस, जैसे जैसे बढ़ती जायेगी; सच कहती हूँ सुंदरता, मेरी और निखरती जायेगी। परवाह नहीं बनाना मुझको, गोरे की या काले की; अगले जनम मे मुझे बनाना, बीवी रेलवे वाले की।। जितने भी हैं शौक मेरे, मैं सब पूरे करवाऊंगी; GM न जब तक बन जाएं, नौकरी तब तक करवाऊंगी। इससे पहले अगर नौकरी, छोड़ने की करेंगे बात; सच कहती हूँ मेरे हाथ के, थप्पड़...

बेटी की पूकार

मेरा कसूर क्या हैं माँ ? हाथों में कलम के बदले , चूडियाँ क्यूँ थमाती हो ? मेरे सपनों के पर कट कर , मेरी बलि क्यूँ चढ़ती हो ? गहनों की ये जंज़ीरे , मेरे पैरों में क्यूँ पहनाती हो ? मेरा कसूर क्या हैं माँ ....     ये मंगलसूत्र और महावर , अभी मुझे नही भाते माँ ... ये खुला आसमान , मुझे बड़ा सुहाना लगता हैं माँ ..... मैं भी उड़ना चाहती हूँ , ऊँचाइयों को छूना चाहती हूँ ..... सावन के झूले से भी , ऊँची पेंगे भरनी हैं माँ ... क्यूँ नही माँ .... मेरा कसूर क्या हैं माँ .... पहले कुछ बन कर , कुछ होना चाहती हूँ .... बाबुल का नाम जग में , रोशन करना चाहती हूँ .... मुझे कलम की ताकत दो बाबा ,  मैं बेटा होकर दिखाना चाहती हूँ ..... हाँ ! मैं भी पहनूँगी एक दिन , तेरे पसन्द की लाल चूड़ियाँ .... माथे पर बड़ी सी बिन्दिया , मैं भी सजाऊँगी ..... तब वो पायल बेंड़ी नही , और बिन्दिया मेरे वजूद पर .... एक चमकता सितारा होगा , और .... सिर्फ उसके नाम की ..... जो मेरे मन का साथी होगा , मेरी माँ का भी बेटा होगा .. मेरा सर जब , स्वाभिमान से तना होगा माँ .... लड़की के नाम पर...

सब मिथ्या है मया है

कई वर्षों तक कशमकश में उलझा रहा मैं | क्योंकि सही और गलत, पाप और पुण्य, नैतिक और अनैतिक की गुत्थी नहीं सुलझा पा रहा था | मैं नहीं समझ पा रहा था कि इनमें से सही क्या है और गलत क्या है | नैतिक होना सही है या अनैतिक होना, पापी होना सही है या पुण्यात्मा होना | आस्तिक होना सही है या नास्तिक होना | धार्मिक होना सही है या अधार्मिक होना | बरसों बाद समझ में आया कि जिससे अपना भला होता हो, जिससे स्वयं को सुख मिलता हो, जिससे अपना बैंकब्लेंस बढ़ता हो, जिससे कार, कोठी, बांग्ला मिलता हो, जिससे पद, प्रतिष्ठा व जय जयकार मिलता हो, वही सही है, बाकी सब मिथ्या है मया है | जैसे सबसे सम्मानित पद होता है आईएस, आईएएस, आइपीएस...आदि का | बहुत ही सम्मानित अधिकारी माने जाते हैं | लेकिन जब यह जानने की कोशिश करता हूँ कि ये लोग करते क्या हैं, ऐसा कौन सा महान काम करते हैं....तो पाता हूँ कि ये अपना ईमान, ज़मीर गिरवी रखकर जनता व देश को लूटने वालों की सहायता करते हैं | और यह बात हर कोई जानता भी है...फिर भी इनका सबसे अधिक सम्मान होता है | हर माँ-बाप का सपना होता है कि उनकी संतान ऐसा ही कोई अधिकारी बने और धूर्त-मक्कार, ...